चुनाव और राजनीति का गिरता स्तर

चुनाव और राजनीति का गिरता स्तर

चुनाव के दिनों में भारतीय राजनीति का स्तर कितना नीचे गिरता जा रहा है। कश्मीरी नेता धमकी दे रहे हैं कि यदि धारा 35 ए को आप हटाएंगे तो कश्मीर का मुख्यमंत्री अपने आप प्रधानमंत्री बन जाएगा। यह बात वित्त मंत्री अरुण जेटली के बयान के जवाब के रुप में आई है। जेटली या मोदी ने यह नहीं कहा है कि वे अगर दुबारा आ गए तो उसे हटा देंगे। उनमें दम होता तो इस बारे में वे चार-पांच साल पहले ही कार्रवाई कर देते। इस तरह के बयान भाजपा नेता इसीलिए दे रहे हैं कि उन्हें देश के हिंदू मतदाताओं को अपनी तरफ पक्का करना है। इसीलिए पुलवामा और बालाकोट को अभी तक गर्म बनाए रखना जरुरी है। उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसीलिए कह मारा कि कांग्रेसी इस्लामी आतंकवादियों को बिरयानी खिलाते हैं जबकि ‘मोदी की सेना’ उनका विनाश करती है। मोदी ने ‘भगवा आतंक’ शब्द के प्रयोग के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया है। इसे हिंदुओं को बदनाम करने का घटिया काम कहा है। खुद मोदी ने राहुल गांधी के केरल से चुनाव लड़ने पर जबर्दस्त ताना मारा है। उन्होंने कहा कि राहुल ने वायनाड इसलिए चुना है कि वहां अल्पसंख्यक याने ईसाई और मुसलमान वोटर ज्यादा हैं। यह भी देश के हिंदू वोटरों को आकर्षित करने की कोशिश है। विरोधी नेता मोदी और योगी के बयानों पर चुनाव आयोग का ध्यान खींच रहे हैं। इन्हें आचार संहिता का उल्लंघन बता रहे हैं। सच्चाई तो यह है कि देश के बहुसंख्यक हिंदुओं के लगभग सभी प्रिय विषयों पर यह सरकार अपने वायदे पूरे करने में असमर्थ रही है। इसीलिए प्रधानमंत्री को प्रचार मंत्री बन जाना पड़ा है। पिछले चार-साढ़े चार साल पहले से ही मुझे पूत के पग पालने में दिखाई पड़ने लगे थे। इसीलिए मैं कहता रहा कि प्रचार मंत्री बनने की बजाय मोदी को प्रधानमंत्री बनकर दिखाना चाहिए। कम से कम अगले दो-ढाई महिनों में मोदी को प्रधानमंत्री पद की उच्च मर्यादा की रक्षा करनी चाहिए। विरोधी नेता चाहे जितने नीचे गिरना चाहें, उन्हें गिरने दें। किसी प्रधानमंत्री को बार-बार ‘चोर’ कहने से विपक्षी नेता की कोई अच्छी छवि बनती है, क्या ?