संभावनाओं को साकार करने का माध्यम बन सकता है चुनाव

संभावनाओं को साकार करने का माध्यम बन सकता है चुनाव

चुनाव के पूरे वातावरण को देखते हुए अनेक समीक्षक प्रश्न उठा रहे हैं कि क्या यह लोकतंत्न को सशक्त करने वाला साबित हो रहा है या फिर इससे हमारा लोकतंत्न अंदर से कमजोर हो रहा है? उम्मीदवारों पर दर्ज आपराधिक मामलों, उनकी घोषित संपत्तियों के आंकड़े, राजनीतिक परिवारों से संबंध, पार्टियों और नेताओं द्वारा उठाए जा रहे मुद्दों, किए गए वायदों, प्रयोग हो रही शब्दावलियों आदि को एक साथ मिला दें तो पूरा चुनाव परिदृश्य हमारे लोकतंत्न की भयावह विकृति का पुंज नजर आएगा. जैसे बरसात में सारी गंदगियां बहते हुए नदी में आ जाती हैं और नदियों का पानी गंदला हो जाता है, ठीक वैसे ही हमारा चुनाव दिख रहा है.

ऐसा लगता है जैसे हमारे लोकतंत्न की सारी गंदगी चुनावी बरसात में उभर कर एक साथ सामने आ गई हो. हालांकि बरसात के अंत के साथ प्रकृति की स्वाभाविक प्रतिक्रियाएं नदियों को फिर से पुरानी अवस्था में ले आती हैं, पर चुनावी बरसात के साथ ऐसा नहीं होता. परिणाम के रूप में जो निकलकर आता है, वह ही लोकतंत्न और देश की नियति का निर्धारण करता है. इस तरह संसदीय लोकतंत्न का सर्वस्व चुनाव है. चुनाव से निकले हुए लोक उत्पाद ही इसके स्तंभों से लेकर दीवालों और छतों का निर्माण करते हैं. साफ है कि अगर चुनाव का पूरा वातावरण तथा राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वच्छ और पवित्न हो तो ही यह लोकतंत्न के लिए उपयोगी है, अन्यथा इसका परिणाम प्रत्यक्ष-परोक्ष अनर्थकारी हो सकता है. तो वर्तमान चुनाव को किस रूप में देखा जाए?

हमारे नेता कह रहे हैं कि चुनाव लोकतंत्न का महापर्व है. बहुत अच्छा! अगर यह ऐसा है तो इसमें पर्व का चरित्न भी होना चाहिए. पवित्नता, निष्ठा, समर्पण, उत्साह, साहचर्य आदि हर पर्व के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा है. तथाकथित चुनावी महापर्व से ये पहलू पूरी तरह न सही काफी हद तक तो गायब हैं. यह तो नहीं कह सकते कि जितने उम्मीदवार खड़े हैं उनमें सभी के विचार अपवित्न हैं या सभी में दल, लोकतंत्न व देश के प्रति निष्ठा का अभाव है, किंतु समग्र रूप में ऐसे लोगों की बहुतायत के कटु यथार्थ को नकारा नहीं जा सकता. जब प्रमुख दल ऐसे चेहरों को शामिल कर उम्मीदवार बना देते हैं जिनका कुछ घंटे पहले उनके दल से कोई रिश्ता ही नहीं था तो हम चुनाव को कैसा महापर्व मानें? अगर इसकी सूची बनाई जाए तो संख्या इतनी बड़ी हो जाएगी कि लोगों को विस्मय होगा. 

तो कुल मिलाकर जब ये सारे लक्षण चुनाव में दिख रहे हों तो आप यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि इससे लोकतंत्न मजबूत होगा तथा देश की नियति संवरेगी? तो क्या यह मान लें कि वर्तमान चुनाव से लोकतंत्न के भविष्य की किसी बेहतर तस्वीर के निकलने की संभावना नहीं है? तमाम विकृतियों के बीच भी ऐसा मान लेना अतिवादी निष्कर्ष ही होगा.

वस्तुत: यहीं पर मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. चुनाव को वास्तविक अर्थो में लोकतंत्न का महापर्व बना देने की जिम्मेवारी अंतत: मतदाताआंे के कंधे पर ही आती है. वोट मांगने वाले नेता आपको अपना मालिक तो कहते ही हैं तो फिर मालिक बनकर दिखा दीजिए. हमारे यहां चुनाव सुधार की बहुत बातें होती हैं. मतदाता के नाते हम अपनी सोच में परिवर्तन करने को तो पहले तैयार हों. यह बात ठीक है कि हमारे पास मतदान करने के लिए पार्टियों ने सीमित विकल्प दिए हैं, किंतु अगर हम स्वयं जाति, संप्रदाय, क्षेत्न, क्षणिक स्वार्थ से ऊपर उठकर केवल देशहित को मतदान का आधार बनाएं तो उपलब्ध विकल्पों में से जो सबसे बेहतर हो उसका चयन किया जा सकता है.

हमारे लोकतंत्न में संभावनाएं अभी भी हैं और चुनाव इनको साकार करने का माध्यम बन सकता है. मतदाताओं का बहुमत यदि आदर्श बनकर मतदान करे तो चुनाव प्रणाली के अनेक दोष अपने-आप खत्म हो जाएंगे और इससे निकलने वाला जन उत्पाद लोकतंत्न को भी दुरु स्त करने की भूमिका निभाएगा.